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kewal sethi
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टूटी हुई खिड़कियाॅं

 

यह लेख टूटी हुई खिड़कियों के बारे में नहीं है। यह स्वच्छता अभियान के बारे में है। अब दोनों का क्या सम्बन्ध है। है भी कि नहीं। पर यह देखा गया है कि भोपाल में दीवारों पर, होर्डिंग पर मोटे मोटे अक्षरों में प्रचार वाक्य देखने को मिलते है - ‘‘हमारा प्रण, भोपाल नम्बर वन’’। अन्य नगरों में भी इसी प्रकार की गतिविधि चल रही है। ध्येय यह है कि हमारा नगर केन्द्रीय सरकार के स्वच्छता सर्वेक्षण में सब से उत्तम पाया जाये।

क्या वास्तव में इन से कोई अन्तर पड़ता है। आईये इस के बारे में विचार करें। राबर्ट काल्डीनी ने न्यू यार्क में एक सर्वेक्षण किया। हस्पताल के सामने पार्किंग स्थान था। कारें खड़ा होती थीं। जब हस्पताल जाने वाले लौटते थे तो विण्ड स्क्रीन में एक विज्ञापन पाते थे जो इतना बड़ा था कि उसे अनदेखा नहीं किया जा सकता था। आस पास कोई कचरे का डिब्बा नहीं था। देखना यह था कि कितने लोग विज्ञापन को वहीं फैंक देते हैं तथा कितने उस साथ ले जाते हैं ताकि रास्ते में कहीं कचरे के डिब्बे में फैंक दें। आस पास और कई विज्ञापन, सिगरेट के टुकड़े, पेपर कप, गोलियों के रैपर डाल दिये गये। पाया गया कि 32 प्रतिश्त लोगों ने विज्ञापन को ज़मीन पर फैंक दिया और कार में बैठ कर चले गये। (याद रखें कि यह अमरीका की बात है, भारत की नहीं)।

दूसरी बार भी वही कार्यक्रम दौहराया गया किन्तु आस पास का स्थान एक दम स्वच्छ था। इस बार केवल 14 प्रतिशत लोगों ने ही विज्ञापन को ज़मीन पर डाला अर्थात पहले परीक्षण की तुलना में आधे से कम।

एक और परीक्षण किया गया। आस पास का क्षेत्र स्वच्छ नहीं था। जब चालक कार के पास आता था तो एक व्यक्ति कुछ दूर पर गुज़रता हुआ चालक के सामने ही एक विज्ञापन ज़मीन पर डाल देता था। इस परीक्षण में चालकों में से 54 प्रतिशत ने विज्ञापन ज़मीन पर डाले।

एक और परीक्षण की बात करें। पार्किंग स्थान में एक गेट बन्द किया गया तथा उस पर लिखा गया कि कृपया अगले गेट से भीतर जायें। अगला गेट लगभग 200 मीटर की दूरी पर था तथा दिखता था। लेकिन गेट में 50 सैण्टीमीटर स्थान खुला छोड़ दिया गया। देखना यह था कि कितने लोग उस में से अन्दर जाते हैं। गेट पर एक और सूचना टांगी गई कि गेट के साथ साईकल को ताला लगाना मना है। चार साईकल गेट के साथ बाॅंध कर रखी गईं। देखा गया कि 82 प्रतिशत लोग उस रिक्त स्थान से अन्दर गये। जब साईकलों को गेट से एक मीटर दूर रखा गया तो केवल 27 प्रतिशत ही उस खुली जगह से भीतर गये।

इन परीक्षणों से पता चलता है कि क्या अपेक्षित बर्ताव है तथा क्या वास्तविक, इस को व्यक्ति आस पास के वातावरण को देख कर तय करता है। जब सब कर रहे हैं तो हमें भी करने में कोई दिक्कत नहीं होती है। जब देख रहे हैं कि सूचनापट के बावजूद साईकल गेट के साथ ताला लगा कर रखी हुई है तो दूसरा नियम भी तोड़ने में हिचक नहीं होती है। पहले परीक्षण में भी यही बात थी। जब आस पास का वातावरण स्वच्छ था तो उसे गन्दा करने में हिचक थी। पर जब पहले ही लोगों ने गंदगी कर रखी है तो उस में वृद्धि करना गल्त नहीं लगा और जब हमारे सामने ही कोई दूसरा कर रहा है तो नियम पालन की भावना और भी कम हो जाती है।

अब लौटें भोपाल की ओर। यदि वास्तव में इन प्रचार वाक्यों के अनुसार कार्य करना है तो दीवार पर लिखने से काम नहीं चले गा। होर्डिंग से काम नहीं चले गा। स्वच्छता पहले रखना रखना हो गी तथा बाद में लोगों से अपेक्षा करना हो गी कि वह भी स्थान को स्वच्छ रखें। परन्तु एक तो कचरे के डिब्बे ही कम हैं, दूसरे सही स्थान पर नहीं हैं, तीसरे उन्हें नियमपूर्वक साफ भी नहीं किया जाता। जब आस पास ऐसा वातावरण हो किसी से प्रचार वाक्य को देखने की अपेक्षा करना तथा उस अनुसार कार्य करने की अपेक्षा करना अर्थहीन है। हमें अपनी प्राथमिकतायें बदलना हों गी।

टूटी क्षिड़कियों की बात तो रह ही गई। उस पर कभी लौटें गे।

(परीक्षण जिन के बारे में बताया गया है, म्यूल क्ैप्टेन की पुस्तक ‘वर्कप्लेस मोरैलिटी’ - प्रकाषक एमेरल्ड - में देखे जा सकते हैं)

 

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February 3, 2017 at 2:04 AM Flag Quote & Reply

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